Tuesday, November 29, 2022
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बचपने बिन बचपन

साधना वैद

समस्या गंभीर है और गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। ऐसा क्यों है कि बच्चों में मासूमियत और बचपना गुम होता जा रहा है। समस्या का सबसे पहला कारण है संयुक्त परिवारों का टूटना। पहले जब समाज की बुनियाद संयुक्त परिवार पर टिकी हुई थी बच्चों के सामने कभी अकेले रहने की समस्या ही नहीं आती थी। दादी, बाबा की कहानियां सुनते उनके साथ बोलते-बतियाते बच्चे सदैव प्रसन्न रहते और उनके अन्दर सामाजिकता और सद्गुणों का खूब विकास होता। दादी-नानी कहानियों के साथ-साथ खूब पहेलियां भी पूछतीं, जिनसे बच्चों का बौद्धिक विकास भी होता और मनोरंजन भी। लेकिन संयुक्त परिवारों के टूटने से अब यह सब कहां? बच्चों को घर में खुल कर हंसते-चहकते हुए देखना अब बहुत ही विरल वस्तु हो गयी है।

दरअसल, माता-पिता बच्चों की सुरक्षा के प्रति इतने सचेत हो गए हैं कि अब पार्क में खेलने वाले बच्चों के समूह कम ही देखने को मिलते हैं। इसकी भरपाई के रूप में माता-पिता उन्हें वीडियो गेम्स दिला देते हैं या महंगे वाले मोबाइल फोन दिला देते हैं। इससे बच्चे एकान्तप्रिय होते जाते हैं। एक तो वैसे ही आजकल के बच्चे अकेले रहना पसंद करने लगे हैं उस पर कोरोना की इस आपदा ने बच्चों को बिल्कुल अकेला कर दिया। जब इतनी छोटी-सी उम्र में बच्चे ऐसी वर्जित बातों की तरफ आकृष्ट होने लगेंगे तो उनमें बचपना, मासूमियत और भोलापन कहां रह जाएगा।

बच्चों में सुसाहित्य के प्रति कम होती रुचि भी इसका एक बड़ा कारण है। बच्चों की पत्रिकाएं अब कहां इतनी लोकप्रिय रह गयी हैं। हमारे समय में नंदन, चंपक, पराग जैसी कई पत्रिकाएं आती थीं, जिसमें मनोरंजन, ज्ञान आदि सब कुछ होता था। आज या तो बच्चों की पत्रिकाएं आती ही नहीं, आती हैं तो मां-बाप के साथ-साथ बच्चों का भी उनके प्रति कोई लगाव नहीं है।

उधर, मनोरंजन के दूसरे साधन टेलीविजन का भी हाल बुरा है। चैनल तो हजारों हैं, लेकिन ढंग की सामग्री गिने-चुने ही देते हैं। टेलीविजन पर भी ज्यादातर सीरियल बेतुके आते हैं। ऊटपटांग डायलॉग और अजीब-सा पारिवारिक माहौल दिखाया जाता है इन सीरियल्स में। जब हमने इसे ही मनोरंजन का पर्याय समझ लिया है तो फिर बच्चों के मन से मासूमियत को खरोंच कर फेंकने का इलज़ाम हम किस पर थोपें। हमें खुद अपनी सोच, अपने व्यवहार और अपनी महत्वाकांक्षाओं का आकलन नए सिरे से करना होगा कि अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हम अपने बच्चों के जीवन से किस तरह से खिलवाड़ कर रहे हैं। क्या यह वास्तव में उचित है?

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